दृश्य : इन्द्र पूजा के विरोध से पहले का संवाद
राधा: कृष्ण तुम हर समय लोगो के विरोध में क्यों कार्य करते हो| क्या तुम्हारा लोगो के द्वारा चाही हुई चीजों से विरोध है? क्या तुम्हे पहेले से चले आ रहे रीती रिवाजो का विरोध करने में मजा आता है क्या?
कृष्ण: राधा ऐसी बात नहीं है| मैं इन रिवाजो का विरोध नहीं करता| परन्तु उनका मैं बिना किसी कारण के विश्वास भी नहीं करता| मेरी ललक चाही हुई से अनचाही की ओर अधिक होती है, क्योंकि चाही हुई तो जानी पहचानी हुई होती है| कल्पना में उसे हम थोड़ा भोग भी लेते हैं, पर अनचाही स्थिति में एक अप्र्त्याशितात्ता है| अचानक से उत्पन्न हुआ एक विषमय का भावः है |
और मेरे लिए इष्ट और अनिष्ट में कोई विशेष अन्तर नही है राधा| एक चाही हुई स्थिति है और दूसरी अनचाही हुई|
नोट: यहाँ आखिरी में राधा शब्द का प्रयोग प्रेम दर्शाने का बहुत अच्छा उदाहरण है|
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Sunday, March 31, 2013
Thursday, July 9, 2009
भावना
भावुकता एक अच्छा गुन है| लेकिन इसका एक भुत बड़ा दोष है की भवुकता की वृद्धि के साथ इन्द्रियों का कार्य भी बाधित होना शुरू हो जाता है| इन्द्रियां व्याकुल होने लगती हैं, और मन विचलित होने लगता है| इससे हम कुछ करने लायक नहीं रह जाते , बस क़तर हो कर रो सकते हैं |
The English verison of the same:
Being emotional is a good trait. Though it has a very big disadvantage, as it increases ones Senses ( touch, listening, viewing, thinking, ...) starts malfunctioning. They get excited, the thought process starts feeling up-lows. These effects makes us idle and the only thing one can do in this situation is to cry.
Note: I think i have not used the proper words to convey the gist, but one can assume that this is more or less the word to word description of the above Hindi verse.
The English verison of the same:
Being emotional is a good trait. Though it has a very big disadvantage, as it increases ones Senses ( touch, listening, viewing, thinking, ...) starts malfunctioning. They get excited, the thought process starts feeling up-lows. These effects makes us idle and the only thing one can do in this situation is to cry.
Note: I think i have not used the proper words to convey the gist, but one can assume that this is more or less the word to word description of the above Hindi verse.
Monday, April 20, 2009
ग्रहणशील होने के लिए तीन बातें
१) हर पल में जीने की कोशिश करें| सहजता से करें|
२) अति गंभीरता से जीवन को न लें| बड़ी सरलता से लें, जैसे खेल को लेंते हैं| वैसे ही जीवन को लें|
३) कोई अधैर्य, कोई जल्दी ना करें| जितनी जल्दी करेंगे उतनी ही देर हो जाती है| और जो जितने धीरता से खड़ा रहताहै, वो उतने ही जल्दी ग्रहण कर लेता है|
उधृत "साक्षी की साधना" द्वारा ओशो
२) अति गंभीरता से जीवन को न लें| बड़ी सरलता से लें, जैसे खेल को लेंते हैं| वैसे ही जीवन को लें|
३) कोई अधैर्य, कोई जल्दी ना करें| जितनी जल्दी करेंगे उतनी ही देर हो जाती है| और जो जितने धीरता से खड़ा रहताहै, वो उतने ही जल्दी ग्रहण कर लेता है|
उधृत "साक्षी की साधना" द्वारा ओशो
Sunday, April 19, 2009
Relationship Vs Time graph an Example
There is always a dark movie theater and two people lost to world, their hands clasped together - but hands do perspire when held for long...
Still it is beautiful to be in love.....
Excerpts from Fountain Head by Ayn Rand.
I would say that its 100% true. Even though the probability of end result is 0.9999. People do fall in love. And I think that given the end result, and the surety of the occurrence of former event by arrangement or of by self decision, why not enjoy the moment of holding each other before it perspires. When it perspires give room to some air and you will be alright again to enjoy.
So cheers and do fall in love :)
Still it is beautiful to be in love.....
Excerpts from Fountain Head by Ayn Rand.
I would say that its 100% true. Even though the probability of end result is 0.9999. People do fall in love. And I think that given the end result, and the surety of the occurrence of former event by arrangement or of by self decision, why not enjoy the moment of holding each other before it perspires. When it perspires give room to some air and you will be alright again to enjoy.
So cheers and do fall in love :)
कथा धैर्य की
कथा है,
नारद वैकुण्ठ जा रहे हैं| मार्ग में उन्हें एक वृद्ध साधु मिला, वृक्ष के नीचे|
उस साधु से कहा की तुम प्रभु से पूछ लेना कि मेरी मुक्ति को अभी कितनी देर और है| मुझे मोक्ष कब मिलेगा?
नारद ने कहा: ठीक है लौटते में जरूर पूछ लूँगा|
पास में उसी दिन दीक्षित हुआ एक फ़कीर अपना तम्बूरा ले के नाच रहा था| नारद ने मजाक में उससे भी कहा: तुम्हे भी पूछना है क्या?
वह फ़कीर कुछ ना बोला|
नारद वापस लौटे, उस वृद्ध साधुके पास जा कर कहा: मैंने पूछा था ईश्वर से| उन्होंने कहा कि अभी तीन जन्म और है|
उस साधु ने अपनी माला नीचे फेंक दी और कहा अन्याय है| कितना धीरज रखूं?
नारद आगे बढ़ गए| अभी भी उस वृक्ष के नीचे नया नया दीक्षित हुआ फ़कीर नाचता था|
नारद ने कहा: सुनते हो। तुम्हारे सम्बन्ध में भी पूछा मैंने| प्रभु ने कहा है कि वह जिस वृक्ष के नीचे नाच रहा है, उसमे जितने पत्ते हैं, उतने जन्म उसे साधना में लगेंगे| उसके बाद ही उसे मुक्ति प्राप्त हो सकेगी|
वह फ़कीर बोला: बस इतने ही पत्ते| "तब तो जीत लिया"| जगत में कितने पत्ते हैं| इस वृक्ष पर तो बहुत कम हैं|
वह फिर से नाचने लगा| और कथा कहती है, वह उसी क्षनद मुक्त हो गया|
सीख: धैर्य ही मुक्ति का साधन है| अधैर्य लम्बा करता है| अधैर्य समय मेहनत व साधना का नाश करता है|
ये कथा "साक्षी की साधना " लेखक -ओशो से उधृत है|
नारद वैकुण्ठ जा रहे हैं| मार्ग में उन्हें एक वृद्ध साधु मिला, वृक्ष के नीचे|
उस साधु से कहा की तुम प्रभु से पूछ लेना कि मेरी मुक्ति को अभी कितनी देर और है| मुझे मोक्ष कब मिलेगा?
नारद ने कहा: ठीक है लौटते में जरूर पूछ लूँगा|
पास में उसी दिन दीक्षित हुआ एक फ़कीर अपना तम्बूरा ले के नाच रहा था| नारद ने मजाक में उससे भी कहा: तुम्हे भी पूछना है क्या?
वह फ़कीर कुछ ना बोला|
नारद वापस लौटे, उस वृद्ध साधुके पास जा कर कहा: मैंने पूछा था ईश्वर से| उन्होंने कहा कि अभी तीन जन्म और है|
उस साधु ने अपनी माला नीचे फेंक दी और कहा अन्याय है| कितना धीरज रखूं?
नारद आगे बढ़ गए| अभी भी उस वृक्ष के नीचे नया नया दीक्षित हुआ फ़कीर नाचता था|
नारद ने कहा: सुनते हो। तुम्हारे सम्बन्ध में भी पूछा मैंने| प्रभु ने कहा है कि वह जिस वृक्ष के नीचे नाच रहा है, उसमे जितने पत्ते हैं, उतने जन्म उसे साधना में लगेंगे| उसके बाद ही उसे मुक्ति प्राप्त हो सकेगी|
वह फ़कीर बोला: बस इतने ही पत्ते| "तब तो जीत लिया"| जगत में कितने पत्ते हैं| इस वृक्ष पर तो बहुत कम हैं|
वह फिर से नाचने लगा| और कथा कहती है, वह उसी क्षनद मुक्त हो गया|
सीख: धैर्य ही मुक्ति का साधन है| अधैर्य लम्बा करता है| अधैर्य समय मेहनत व साधना का नाश करता है|
ये कथा "साक्षी की साधना " लेखक -ओशो से उधृत है|
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